राम गोपाल "गार्ग्य"

भारत में सामाजिक समरसता तब नया मोड़ ले लेती है जब कोई प्रशासनिक अधिकारी ऐसी टिप्पणी कर देता है जो समाज में दबी हुई मानसिकताओं को अचानक सतह पर ला देती है। मध्य प्रदेश के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा का हालिया बयान इसी श्रेणी में आता है। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि आरक्षण तब तक मिलता रहना चाहिए जब तक ब्राह्मण अपनी बेटी उनके बेटे को न दे दे। यह कथन केवल असावधानी में बोला गया  वाक्य नहीं है, यह संकेत है उस सोच का जो ब्राह्मण समाज को लक्ष्य बनाकर उसकी सांस्कृतिक गरिमा को चुनौती देती रहती है।

इस कथन की आलोचना इसलिए भी आवश्यक है कि यह किसी साधारण व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की आवाज़ है। ऐसा अधिकारी जब किसी वर्ग को सामाजिक बराबरी के बदले अपनी बेटियाँ देने की नसीहत देता है, तब यह केवल सामाजिक विमर्श नहीं, बल्कि गहरे भीतर जड़ जमाए पूर्वाग्रह का उद्घाटन बन जाता है, जो उनके भीतर रोपा गया है। जिससे इतनी पढ़ाई के बाद भी उसको छुटकारा नहीं मिल पा रहा।

मेरे जीवन के अनुभव इस कथन को और भी गंभीर बना देते हैं। सामाजिक समरसता की चर्चा जब-जब अन्य समुदायों के सुशिक्षित, प्रभावशाली और आधुनिक माने जाने वाले व्यक्तियों के साथ हुई, उसका अंतिम निष्कर्ष अक्सर यही होता था कि समानता तभी संभव है जब ब्राह्मण अपनी बेटी उनकी जाति में दे। जब उनसे पूछा जाता था कि क्या वे भी अपनी बेटियों को समानता के नाम पर अपने वर्ग कि अन्य जातियों में देंगे, तो जवाब हंसी में टाल दिया जाता था।

इस दोहरे मापदंड की जड़ें आज की राजनीति या नौकरशाही में नहीं पैदा हुईं। यह मानसिकता सदियों में बनी है और इसका विश्लेषण करने के लिए हमें इतिहास के छह महत्वपूर्ण स्रोतों अल-बिलाधुरी, अल-तबरी, चचनामा, फरिश्ता, ज़ियाउद्दीन बरनी और मिनहाज-ए-सिराज की ओर देखना होगा। ये छह स्रोत एक व्यापक पैटर्न की ओर संकेत करते हैं कि ब्राह्मण समाज को लगातार लक्षित किया गया, राजनीतिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से और पारिवारिक-सामाजिक स्तर तक।

711–12 ईस्वी का अरब आक्रमण भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का वह मोड़ है जिसके दस्तावेज आज भी उपलब्ध हैं। चचनामा, अल-बिलाधुरी और अल-तबरी तीनों यह रिकॉर्ड करते हैं कि ब्राह्मण राजा दाहिर के विरुद्ध स्थानीय कबीलों और अन्य समूहों ने अरब से हाथ मिलाया। जब विजय मिली, तो सबसे पहले लूटा गया ब्राह्मणों का धन, ब्राह्मणों की संस्थाएँ और विशेष तौर पर ब्राह्मणों की स्त्रियाँ उनकी बेटियां । चचनामा में यह प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखित है कि दाहिर की कन्याओं को युद्ध-लूट का हिस्सा बनाकर अरब दरबार ले जाया गया। अरब इतिहासकार इसे गर्व से लिखते हैं और यही सबसे बड़ा संकेत है कि ब्राह्मणों की स्त्री/ बेटी के सम्मान को तोड़ना उस समय आक्रमण का मनोवैज्ञानिक हथियार था। यही प्रवृत्ति बाद में तुर्क-अफगान शासन में और भी प्रखर हो गई।

मिनहाज-ए-सिराज की तबक़ात-ए-नासिरी, बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही और फरिश्ता के इतिहास-ग्रंथ इस बात से भरे पड़े हैं कि सत्ता परिवर्तन के हर चरण में ब्राह्मण पहले निशाने पर थे। कई अभियानों में ब्राह्मण गाँवों को सामूहिक दंड दिया गया, मंदिरों और ब्राह्मण शिक्षण केंद्रों का विनाश किया गया, जबरन धर्मांतरण किया गया, ब्राह्मण नेताओं को सज़ाएँ दी गईं और ब्राह्मण स्त्रियों को युद्ध-विजय का प्रतीक बनाया गया। बरनी ने कई स्थानों पर लिखा है कि ब्राह्मणों को नीचा दिखाना शासन के स्थायित्व का साधन है। मिनहाज-ए-सिराज यह दर्ज करते हैं कि ब्राह्मण धार्मिक और बौद्धिक नेतृत्व रखते थे, इसलिए उन्हें तोड़ना जरूरी माना गया। फरिश्ता भी कई हमलों में यही नोट करते हैं कि सबसे कठोर कार्रवाई ब्राह्मणों पर होती थी। इन स्रोतों को मिलाकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्राह्मण समाज को केवल राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शक्ति केन्द्र होने के कारण निशाना बनाया जाता था।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की आग बेशक मंगल पांडेय जैसे ब्राह्मण सैनिक ने भड़काई लेकिन इसके मूल में भी ब्राह्मण ही थे, जिन्होनें पुरे हिन्दू समाज को एक कर दिया। फांसी दिए गए, बुलडोजर से कुचले गए और गोलियों से उड़ा दिए गए लोगों की जातियाँ ढूंढिए तब पता लगेगा की 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हर जाति का सामूहिक संगम था, जिन्हें संगठित करने की जड़ ब्राह्मणों में थी। इससे पहले ब्रिटिश सेना में ब्राह्मण रेजिमेंटें मौजूद थीं। विद्रोह के बाद ही अंग्रेजों ने निष्कर्ष निकाला कि यह वर्ग अत्यधिक शिक्षित, संगठित और विचारवान है, इसे सामूहिक रूप से हथियारबंद रखना सत्ता के लिए खतरा है। नतीजा यह हुआ कि ब्राह्मण रेजिमेंटों को धीरे-धीरे भंग कर दिया गया। साथ ही ऐसा कानून बनाया गया की आप घर में सब्जी काटने का चाकू भी एक साइज से बड़ा न रख सकें। यह भी उसी ऐतिहासिक पैटर्न की कड़ी है जहाँ ब्राह्मणों को लक्षित करने की प्रवृत्ति दोहराई जाती रही।

जब आईएएस संतोष वर्मा कहते हैं कि ब्राह्मण बेटी तब तक दी जानी चाहिए, जब तक आरक्षण मिलता रहे, तब वे अनजाने में अपने अंदर बैठी उसी विकृत ऐतिहासिक प्रवृत्ति को दोहरा रहे होते हैं जिसमें ब्राह्मण वर्ग को देश के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व तोड़ने की रणनीति के रूप में देखा जाता था। उनका कथन यह साफ़ संकेत देता है कि उनमे समानता की इच्छा नहीं, बल्कि एक विशिष्ट वर्ग को झुकाने की ऐतिहासिक मानसिकता आज भी जीवित है।

समानता का मापदंड यदि विवाह में केवल ब्राह्मण कन्या हो, तो यह समानता नहीं, एक पुरानी विकृत ग्रंथि का आधुनिक विस्तार है। सदियों में यह पैटर्न इतना बार दोहराया गया कि कई अन्य समुदायों में एक मनोवैज्ञानिक धारणा बन गई है कि ब्राह्मण बेटी यदि उनके घर आए तो वे सामाजिक रूप से ऊपर उठ जाएँगे। इसका उलट अपनी बेटी का विवाह अपने ही वर्ग के अन्य जाति के घर न करना उनके लिए सामाजिक श्रेष्ठता मान लिया गया है।

इस विकृति को समझे बिना आरक्षण, जाति राजनीति और सामाजिक समरसता का कोई भी विमर्श अधूरा रहेगा। वर्मा का बयान इसी मानसिक संरचना से जन्मा है जिसमें ब्राह्मण या ब्राह्मण स्त्री एक प्रतीक बनकर खड़ी होती है बराबरी की नहीं, बल्कि दंड और स्वीकृति की। आईएएस संतोष वर्मा की टिप्पणी यह साबित करती है कि इतिहास का बोझ आज भी सामाजिक मन में जीवित है। अरब इतिहासकारों से लेकर बरनी, मिनहाज और फरिश्ता तक सभी स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं कि ब्राह्मण समाज को बार-बार निशाना बनाया गया। वर्तमान में यह निशाना राजनीतिक भाषा बदलकर सामने आता है, लेकिन मंतव्य वही रहता है, ब्राह्मण समुदाय के सांस्कृतिक आत्मसम्मान को चुनौती देना और समानता को विवाह संबंध जैसी अव्यावहारिक शर्तों पर टांग देना।

यदि समाज वास्तव में समानता की ओर बढ़ना चाहता है, तो उसे पहले इस मानसिकता की पहचान करनी होगी।

एक आईएएस अधिकारी द्वारा व्यक्त विकृत मानसिकता समाज में विभाजन और अविश्वास को जन्म देता है, यदि यही पूर्वाग्रह अन्य वर्गों में भी फैलने लगे तो स्थिति केवल सामाजिक तनाव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह कानून‑व्यवस्था और प्रशासनिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन जाएगी।

जहाँ अधिकारी न्याय की जगह पूर्वाग्रह को बढ़ावा देने लगें, वहाँ कानून की कठोरता ही व्यवस्था को संतुलित रख सकती है।