बीते कुछ समय से भारत में सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली गतिविधियाँ एक गहरी और चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही हैं। एक्स प्लेटफॉर्म के नए लोकेशन फीचर ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश की राजनीतिक बहस का हिस्सा बनने वाले कई प्रभावशाली अकाउंट वास्तव में विदेशों से संचालित हो रहे हैं। भाजपा नेता संबित पात्रा के आरोपों के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि कांग्रेस से जुड़े कुछ नेता, राज्य इकाइयों और विचारधारात्मक समर्थकों के अकाउंट विदेशी लोकेशन से क्यों दिखाई दे रहे थे। क्या यह सिर्फ तकनीकी त्रुटि है, या फिर भारत की राजनीति और सामाजिक चर्चा को विदेशी धरती से प्रभावित करने की बड़ी, संगठित कोशिश का संकेत? यह आरोप तब और गंभीर हो जाते हैं जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार ऐसी रिपोर्टें आती हैं जो भारत के भीतर उत्पन्न चुनौतियों को वैश्विक नैरेटिव में बदलकर उसकी छवि पर चोट करती हैं।
बीते दिन भाजपा नेता संबित पात्रा ने कांग्रेस और उससे जुड़े प्रभावशाली सोशल मीडिया अकाउंट्स पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि एक्स प्लेटफॉर्म के नए लोकेशन फीचर ने कई ऐसे अकाउंट्स का पर्दाफाश कर दिया है जिनके जरिए भारत के खिलाफ विदेशी धरती पर बैठकर नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। पात्रा के मुताबिक कांग्रेसी नेताओं और समर्थक समूहों के कई अकाउंट भारत के बाहर दिख रहे थे। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पवन खेड़ा, हिमाचल कांग्रेस और महाराष्ट्र कांग्रेस के अकाउंटों की लोकेशन अमेरिका और आयरलैंड में होने का दावा किया। उनके अनुसार, विवाद सामने आते ही कई अकाउंट्स ने अपनी लोकेशन बदल ली या छिपा दी।
यह भी हो सकता है की आज या कल में कुछ और नेताओं के अकाउंट भी अपनी लोकेशन अमेरिका या अन्य जगह की दिखाएं, यह भाजपा नेताओं के भी हो सकते है। लेकिन क्या यह लोकेशन साबित कर पाएंगे की वह कोई नैरेटिव गढ़ रहे हैं ? जबकि कांग्रेस नेता अक्सर विदेशी धरती पर ऐसी बातें करते अक्सर नजर आ ही जाते हैं।
दूसरा,यह आरोप सिर्फ सोशल मीडिया की तकनीकी सेटिंग का मामला नहीं है, इसकी जड़ें उस व्यापक चिंता में हैं कि विदेशी धरती से भारत के भीतर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं को प्रभावित करने की कोशिशें हो रही हैं। पात्रा ने यही संदेश दिया कि यह केवल व्यक्तिगत अकाउंट का मामला नहीं, बल्कि एक बड़े नेटवर्क का संकेत है। इसी बहाने भारत में बार-बार उठने वाले उस प्रश्न की ओर ध्यान फिर जाता है कि क्या विदेशी फंडिंग या विदेश-आधारित नैरेटिव मशीनें भारत की राजनीति और समाज को प्रभावित कर रही हैं।
सोशल मीडिया आज विचार निर्माण का सबसे शक्तिशाली माध्यम बन चुका है। ऐसे में किसी प्रभावशाली राजनीतिक या मीडिया अकाउंट का भारत के बाहर से ऑपरेट होना सवाल खड़ा करता है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का अकाउंट अमेरिका में दिखने, हिमाचल कांग्रेस का अकाउंट विदेश में दिखने या महाराष्ट्र कांग्रेस के अकाउंट का आयरलैंड लोकेशन से जुड़ना इसलिए चर्चा में आया क्योंकि यह उस पुराने मुद्दे को मजबूत करता है कि विदेशों में बैठे समूह भारत में राजनीतिक माहौल को प्रभावित करते हैं।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का अकाउंट अमेरिका में दिखने, हिमाचल कांग्रेस का अकाउंट विदेश में दिखने या महाराष्ट्र कांग्रेस के अकाउंट का आयरलैंड लोकेशन से जुड़ना इसलिए चर्चा में आया क्योंकि यह उस पुराने मुद्दे को मजबूत करता है कि विदेशों में बैठे समूह भारत में राजनीतिक माहौल को प्रभावित करते हैं।
पात्रा ने यह भी कहा कि कुछ पत्रकार, कारवां इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म और ऑल्ट न्यूज़ जैसे तथ्य-जांच समूह भी अपने अकाउंट विदेश से संचालित दिखा रहे थे। कांग्रेस ने इसे तकनीकी त्रुटि बताया, जबकि एक्स के स्पष्टीकरणों में यह भी कहा गया कि वीपीएन का उपयोग लोकेशन बदल सकता है। लेकिन यह बहस यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि मूल प्रश्न यह है कि यदि विदेशी धरती से कोई समूह लगातार भारत की राजनीति, समाज और धार्मिक स्थितियों पर पोस्ट कर रहा है, तो इसका उद्देश्य क्या है और इसका असर किस दिशा में जाता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैरेटिव का निर्माण अक्सर कूटनीति से ज्यादा प्रभावशाली होता है। यह वही नैरेटिव है जो किसी देश की छवि तय करता है, किसी सरकार की नीतियों को सही या गलत ठहराता है और किसी देश की वैश्विक स्थिति को प्रभावित करता है। भारत भी इसका अपवाद नहीं।
बीते एक दशक में कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत की आंतरिक स्थितियों को इस तरह पेश किया गया है मानो भारत धार्मिक अत्याचार का केंद्र बन चुका हो। जबकि भारत सरकार ऐसे सभी आरोपों को झूठा, भ्रामक और राजनीतिक हितों से प्रेरित बताती रही है। यहाँ सवाल यह है कि क्या ये रिपोर्टें सिर्फ मानवाधिकार विश्लेषण हैं, या यह एक संगठित प्रयास है भारत के बारे में नकारात्मक छवि तैयार करने का।
यूएससीआईआरएफ की 2024 रिपोर्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आप चाहे तो इसे खुद देख और समझ सकते हैं। इस अमेरिकी संस्था ने दावा किया है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति खराब हुई है। रिपोर्ट में कहा गया कि चुनावों के दौरान मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए गए, और यही भाषण हिंसा बढ़ाने का कारण बने। इसके अलावा रिपोर्ट ने यूएपीए और एफसीआरए जैसे कानूनों को ‘दमनकारी’ बताते हुए कहा कि भारत इनका उपयोग पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक समुदायों पर कर रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सीएए से मुस्लिम समुदाय में डर है, एनआरसी नागरिकता संकट पैदा कर सकता है, और विभिन्न राज्यों में मस्जिदों और मुस्लिम संपत्तियों पर की गई कार्रवाइयाँ धार्मिक पक्षपात का संकेत हैं।
हालांकि भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को हमेशा की तरह पूर्वाग्रहपूर्ण बताया। भारत का रुख है कि यूएससीआईआरएफ जैसी एजेंसियाँ न तो भारत की सामाजिक वास्तविकताओं को समझती हैं और न ही देश की संवैधानिक व्यवस्था को। भारत बार-बार कह चुका है कि वह किसी भी विदेशी संस्था को अपने आंतरिक मामलों में दखल की अनुमति नहीं देगा।
रिपोर्ट में कई विवादित उदाहरण भी दिए गए,जैसे उमर खालिद, मीरा हैदर और शरजील इमाम की गिरफ्तारी, यूपी की एंटी-कन्वर्ज़न मामलों में सज़ाएँ, मणिपुर की हिंसा और कथित काउ-विजिलेंट घटनाएँ। यूएससीआईआरएफ के इस रुख से यह प्रश्न और मजबूत होता है कि क्या यह विश्लेषण है या एक खास राजनीतिक सोच की अभिव्यक्ति।
भारत में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के लिए गाय और उससे उत्पन्न दूध, घी बल्कि गोबर तथा मूत्र भी आस्था का प्रश्न है, हर पूजा में भारतीय इन उत्पादों का उपभोग करता है। वहीँ अमेरिका अपनी गायों का उत्पाद भारत में भेजना चाहता है जिन गायों को वह नॉन वेज फीड देता है। सोचने का विषय है की ऐसा अमेरिका हमारे विषय में सही रूप में क्या ही सोच सकता है ?
भारत में विदेशी फंडिंग की बहस नई नहीं है। कई एनजीओ ऐसे रहे हैं जिनकी फंडिंग के स्रोत सवालों में रहे हैं और जिन पर आरोप लगा कि वे भारत में विरोध आंदोलनों को बढ़ावा देते हैं या सामाजिक तनावों को वैश्विक स्तर पर उछालते हैं। एफसीआरए में संशोधन इसी चिंता को देखते हुए किया गया था। सरकार का कहना है कि वह सिर्फ उन फंडिंग स्रोतों को सीमित करना चाहती है जो भारतीय समाज में अस्थिरता या भ्रम फैलाने के उद्देश्य से धन भेजते हैं।
यूएससीआईआरएफ यह संशोधन दमनकारी कहती है, जबकि भारत इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा मानता है।
संबित पात्रा ने जब कांग्रेस और उससे जुड़े नेताओं पर विदेशी धरती से भारत विरोधी नैरेटिव चलाने का आरोप लगाया, तो उसी क्षण यह मुद्दा केवल तकनीकी बहस नहीं रह जाता। यह वास्तव में यह दिखाता है कि भारत और विदेशों में बैठे समूहों के बीच सूचना युद्ध किस स्तर तक पहुँच चुका है। कांग्रेस इसका राजनीतिक उपयोग बताकर खारिज करती है, लेकिन यह भी सच है कि कई विदेशी रिपोर्टें बार-बार भारत की छवि को नकारात्मक दिखाने में लगी रहती हैं।
सोशल मीडिया लोकेशन विवाद, यूएससीआईआरएफ की रिपोर्टें, विदेशी थिंक-टैंक्स की आलोचनाएँ, वैश्विक मीडिया में बार-बार वही आरोप यह सब मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। क्या यह वास्तव में भारत की छवि पर हमला है? क्या यह एक संगठित, योजनाबद्ध प्रयास है? या यह केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा है, जिसमें हर देश दूसरे की आलोचना करता है?
भारत आज एक उभरती हुई शक्ति है। ऐसे में वैश्विक राजनीति में यह स्वाभाविक है कि उस पर दबाव भी बनेगा और आलोचनाएँ भी होंगी। लेकिन जब सोशल मीडिया अकाउंट विदेशों से संचालित दिखते हैं, जब विदेशी रिपोर्टें भारत को लगातार नकारात्मक रोशनी में पेश करती हैं, जब विदेशी संस्थाएँ भारतीय नीतियों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करती हैं, तो यह केवल मानवाधिकार का मुद्दा नहीं रह जाता। यह सीधे–सीधे उस सूचना युद्ध का हिस्सा बन जाता है जिसमें भारत की छवि, भारतीय समाज की स्थिरता और भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता को चुनौती मिलती है।
यह समझना भी जरूरी है कि विदेशी रिपोर्टों का अर्थ यह नहीं कि देश में कोई समस्या नहीं है। समस्याएँ हर लोकतंत्र में होती हैं। लेकिन जब इन समस्याओं को संदर्भ से काटकर, बढ़ा-चढ़ाकर और राजनीतिक ढंग से पेश किया जाता है, तो यह एक नैरेटिव युद्ध बन जाता है।
यही वह बिंदु है जिस पर संबित पात्रा ने हमला बोला। और यही वह कारण है जिसके चलते विदेशी फंडिंग, विदेशी नैरेटिव और विदेशी एजेंडों की बहस आज भारत में पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
(लेखक, हरियाणा वार्ता के संपादक हैं।)


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