जींद और सोनीपत की जन आशीर्वाद रैलीयों में हरियाणा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बडोली और सीएम नायब सैनी की जोड़ी अपने पूरे लय ताल में नजर आई और लय भी ऐसी की कांग्रेस और विपक्ष की सारी अफवाहों पर जो वह कई दिन से फैला रही थी, कि सीएम नायब सैनी और प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बड़ौली के बीच कुछ अच्छा नहीं है, पर दोनों ने पानी फेर दिया। इन रैलियों में दोनों ने स्पष्ट कर दिया कि प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल और सीएम नायब सैनी के बीच कैसी भी कोई दरार नहीं है, और भाजपा में एंटी-इनकंबेंसी का कोई डर भी नहीं है। एक काम अच्छा हुआ कि इन रैलीयों में पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर नहीं आए। मैनें उनका न आना क्यों अच्छा कहा, वह मैं आगे बताऊंगा। रेली में कई वक्ता बोले लेकिन जो शुरुआत प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बडोली ने की और इसका समापन नायब सिंह सैनी ने किया उसने हरियाणा की राजनीती को एक नया सन्देश देने का काम किया। मोहनलाल बडोली ने कांग्रेस के प्रचार पर हमला बोलते हुए कहा की विपक्ष/कांग्रेस ने अफवाह फैलाई की अमित शाह रैली में आ रहे हैं जबकि उनकी पार्टी भाजपा ने कभी नहीं कहा कि अमित शाह आ रहे हैं। यह कांग्रेस और उसके द्वारा प्रभावित कुछ मीडिया,सोशल मीडिया समूहों का झूठ था। उन्होंने कहा की कांग्रेस के झूठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ने वाली। उन्होंने यह भी कहा कि हमने 56 दिन में नायब सैनी का छोटा सा ट्रेलर देखा है, पूरी फिल्म आना अभी बाकी है।
सीएम नायब सैनी ने भी कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि सीएम बनने के बाद से अब तक आचार संहिता लगने तक, उन्हें 56 दिन का समय मिला जिसमें उन्होंने 128 काम किए। उन्होंने कांग्रेस द्वारा भाजपा के 10 सालों का हिसाब मांगने पर, अपने 56 दिनों में किए गए कामों को तो गिनवाया ही साथ-साथ भूपेंद्र हुड्डा पर सवाल उठाया कि कांग्रेस सरकार के समय तो जमीनों पर सेक्शन 4 में 6 लगाकर दिल्ली के दामाद की सेवा कर रहे थे। उन्होंने शायराना अंदाज में कहा कि, दिल में कसक चेहरे पर नकाब लिए फिरते है, जिनके खुद के खाते खराब हैं वह मेरा हिसाब लिए फिरते हैं।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बडोली और सीएम नायब सैनी दोनों रैली के दौरान उत्साह और आत्मविश्वास से भरे नजर आ रहे थे। हालांकि की पूर्व की कई सभाओं और रैलियों में भी दोनों की जोड़ी ऐसे ही उत्साह से बोल रही थी, लेकिन उस पर किसी का ध्यान जाता नजर नहीं आ रहा था, न वो कोई प्रभाव छोड़ पा रहे थे। जैसे मैंने कहा था कि रैली में पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का नहीं आना अच्छा रहा। मनोहर लाल खट्टर की अनुपस्थिति ने रैलियों को एक अलग दिशा दी। उनकी न होने की वजह से प्रदेश अध्यक्ष और सीएम की आवाज में स्पष्टता और प्रभाव देखने को मिला। इससे यह संदेश मिला कि नए नेतृत्व में भाजपा चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। यदि मनोहर लाल खट्टर रैली में मंच पर मौजूद होते तो जो उत्साह और आत्मविश्वास परदेश अध्यक्ष और सीएम की आवाज से कार्यकर्ताओं तक जाता नजर आया, उसकी महक मनोहर लाल खट्टर की उपस्थिति चुरा लेती। तब पहले की तरह ही यही नजर आता कि सीएम और प्रदेश अध्यक्ष को वह ही निर्देशित कर रहे हैं। जो मनोहर लाल चाहते हैं, वही दोनों बोल रहे हैं। जनता की छोड़िए रैली में मौजूद कार्यकर्ता तक वह मैसेज जा ही नहीं पता, जो दोनों की जोड़ी ने दिया कि हरियाणा में भाजपा के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई एंटी इंकम्बेंसी नाम की चीज नहीं है। आम भाजपा कार्यकर्ताओं ने 10 वर्षों बाद शायद यह महसूस किया होगा कि नए नेतृत्व में वह इस बार चुनाव लड़ने जा रहा है।
बात भाजपा कार्यकर्ताओं के मन की-
जजपा के नेताओं का पार्टी में शामिल किया जाना उन सीटों पर भाजपा कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरना तय है जिन पर पूर्व जजपा विधायकों को भाजपा नेतृत्व टिकट देगा। पूर्व कांग्रेसी नेता और अपनी पार्टी बना चुके विनोद शर्मा की पत्नी शक्ति रानी शर्मा को जींद रैली मंच पर भाजपा में शामिल किया गया। वह भी टिकट की प्रबल दावेदार है तथा बीजेपी के नेता इन सीटों पर इन्हें अनदेखा करने की हिम्मत जुटा पाए ऐसा लगता नहीं है। ।
किसी भी पार्टी के असली कार्यकर्ता,असली कार्यकर्ताओं से आशय उन कार्यकर्ताओं से है जो लम्बे समय से पार्टी का झंडा उठाए पार्टी की नीतियों का प्रचार प्रसार करते हैं। जो बुरे समय में भी पार्टी के साथ तन,मन और धन से खड़े रहते हैं। ऐसे ज्यादातर कार्यकर्त्ता या तो मध्यम वर्गीय होते हैं या फिर निम्न मध्यम वर्गीय। ऐसे आम कार्यकर्ताओं के लिए स्थिति सबसे ख़राब होती है। वो पार्टी के सही समय आने तक जी जान से मेहनत करता है। वो भी सही समय आने पर चाहता है की पार्टी उसे टिकट देकर चुनाव लड़वाए। ऐसे कार्यकर्ताओं को तब दुःख होता जब पार्टी उनके बजाय, किसी बाहरी, धनी या बाहुबली को उसके उपर थोप देती है। भाजपा कार्यकर्ता के लिए तो ऐसी स्थिति ज्यादा दुखदायी ही है। भाजपा के चुनावी चाणक्य कहलाने वाले और देश के गृहमंत्री अमित शाह भाजपा कार्यकर्ताओं के इस दुख और गुस्से को शायद पहचान गए थे। यही कारण था कि उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही पंचकूला में ही बैठक में साफ कहा था, कि अब कोई नई जॉइनिंग बीजेपी में नहीं की जाएगी। अगला चुनाव नायब सैनी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। यह संदेश साफ़ था कि अब पुराने कार्यकर्ताओं को तरजीह मिलना तय है। लेकिन मनोहर लाल खट्टर ने इस सन्देश को न हीं अपनाया, न ही अपने ऊपर लागू किया। केंद्र में मंत्री बनाए जाने के बाद भी अब तक 1 सितंबर की रैलियों को छोड़ दे, तो उनकी मौजूदगी प्रदेश के हर छोटे बड़े कार्यक्रम में नजर ही नहीं आई बल्कि ऐसा लगा जैसे वो ही हर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि या संयोजक है।
उनकी उपस्थिति ने जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं को यही संदेश दिया कि नायब सैनी मात्र एक मुखौटा है, असली चेहरा मनोहर लाल ही है। यही कारण रहा कि सीएम बनने के बावजूद नायब सैनी से या प्रदेशाध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली से अब तक भाजपा कार्यकर्ता भी कनेक्ट नहीं कर पाएं हैं। शायद हरियाणा में मनोहर लाल की उपस्थिति ही वह बड़ा कारण भी रही की नायब-मोहन, मनोहर लाल की जनता से सीधी जुडी उन दो योजनाओं पर भी कोई बात नहीं कर पाए जो आज भाजपा से हरियाणा की जनता की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। तीसरी भी है प्रशासनिक तंत्र पर मनोहर की ढीली पकड़ और अधिकारीयों का भ्रष्टाचार । मैं पहले भी अपनी दूसरी वीडियो में इन दो योजनाओं के बारे में बात कर चुका हूं। यह दो योजनाएं हैं -परिवार पहचान पत्र और प्रॉपर्टी आईडी।
सोनीपत और जींद की रैलीयो में तो नायब-मोहन की जोड़ी भाजपा कार्यकर्ताओं में अपनी छाप छोड़ने में सफल रही। अच्छा होता की वो इन दो योजनाओं से भी प्रदेश की जनता को छुटकारा दिलवा पाते। या कम से कम इस पर बोलते /कोई निर्णय लेते तो और अच्छा होता। इन योजनाओं पर जनता से सीधे संवाद कर वो जनता से सीधे जुड़ सकते थे। खैर,अगर दोनों मनोहर छाया से बाहर निकल पाए तो ऐसे ही मौके अभी आगे भी हैं।
इस रैली में पहले अमित शाह और फिर मनोहर लाल खट्टर का भी ना आना, भविष्य का एक संकेत भी हो सकता है, कि इशारों को ना समझने वाले या समझ कर भी अनदेखा करने वाले मनोहर लाल खट्टर को अब खुलकर समझा दिया गया है, कि उन्हें अब हरियाणा भाजपा से दूरी बना लेनी चाहिए। सच क्या है यह जल्द ही सामने आ जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो यही हरियाणा भाजपा के लिए अच्छा ही होगा। आम कार्यकर्ताओं के लिए कुछ बदलेगा, उन्हें टिकट दिए जाएंगे न तो इसकी कोई पुख्ता जानकारी है, न ही मुझे लगता है की ऐसा होगा । हाँ,टिकट लेने के लिए एक योग्यता तो में पक्के तौर पर जानता हूँ, जो कोई भी कायकर्ता हासिल कर ले तो आसानी से टिकट पा सकता है, उसकी कमी लगभग हर आम कार्यकर्त्ता में होती है ,और वह है पैसा । इसके बिना चुनावी राजनीति में आम कार्यकर्ताओं की भूमिका अक्सर सीमित होती है, भले ही उनके पास अपने क्षेत्र के लिए कितनी ही अच्छी नीतियाँ, सिद्धांत, और विकास के लिए सम्यक दृष्टि हो।

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