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भाजपा नेतृत्व नहीं कर पा रहा था। वो राहुल गाँधी ने जाने अनजाने भाजपा के लिए कर दिया है। भाजपा इसका फायदा ले पाएगी या नहीं इसका जवाब तो भाजपा नेताओं की कार्यप्रणाली पर निर्भर करेगा। इसके लिए हरियाणा भाजपा को राहुल को धन्यवाद देना चाहिए। अगर धन्यवाद नहीं, तो कम से कम भाजपा नेता और प्रवक्ता उनके लिए बच्चा बुद्धि शब्द का प्रयोग करना बंद कर सकते हैं। यह भी उनके लिए धन्यवाद ही साबित होगा। हुआ यह है की हरियाणा भाजपा के खिलाफ धीरे धीरे बढ़ रही सत्ता विरोधी लहर के आगे, राहुल गांधी ने दिवार बनने का काम किया है।  पिछले दिनों दिल्ली बैठक में उन्होंने राहुल गाँधी ने कहा कि हरियाणा में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी से गठबंधन में चुनाव लड़ना चाहिए। इस बयान ने राज्य की राजनीति में नई हलचल मचा दी है और कांग्रेस की संभावनाओं को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। राहुल गांधी के इस बयान से यह साफ़ होता है कि कांग्रेस हरियाणा में अपने दम पर चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है। आम आदमी पार्टी से गठबंधन की चर्चा ने यह संकेत दिया है कि भाजपा के खिलाफ कोई बड़ी सत्ता विरोधी लहर नहीं है। इससे भाजपा को एक बार फिर राज्य में सत्ता बरकरार रखने की संभावना मिल सकती है, बशर्ते वह सही कदम उठाए।  भाजपा की कुछ नीतियों से बेशक प्रदेश की जनता नाराज है,जिसका खामियाजा लोकसभा चुनाव में लोगों ने मोदी से वसूला भी और अगर उस 5 सीटों की हार से सबक लेकर भाजपा ने कुछ नहीं किया तो इस विधान सभा में उसकी हार तय है। आम आदमी पार्टी से कांग्रेस के गठबंधन की कहकर राहुल गाँधी ने यह खुद स्वीकार किया की दो बार सरकार बनाने के बावजूद प्रदेश भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर तो कतई नहीं है और भाजपा तीसरी बार भी सरकार बना सकती है। कांग्रेस के नेताओं ने यह कहकर राहुल के बयान को संभालने का प्रयास किया कि उन्होंने राहुल गांधी ने इस पर फैसला लेने का अधिकार प्रदेश कांग्रेस को दिया है। अगर प्रदेश नेतृत्व को सही लगता है तो वह आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन कर सकती है। जबकि सच यह है की उन्होंने इसके लिए 4 सदस्यीय कमिटी का गठन भी कर दिया है। जो सीटों के बंटवारे पर मंथन करेगी। एक कहावत है कि मारते का हाथ रोका जा सकता है, बोलते का मुंह नहीं। 

मैं यह कहता रहा हूँ  की भाजपा अगर चाहे तो तीसरी बार भी सरकार बना सकती है ,बस उसे भ्रस्टाचार की जनक दो योजनाओं तथा सरकारी अधिकारीयों के  रहमो करम से जनता को निजात दिलवाने का वायदा करना होगा । राहुल के पास यह सटीक जानकारी है, कि हरियाणा कांग्रेस की स्थिति एक तरफा जीतने वाली पार्टी की नहीं है। इस जानकारी के आधार पर ही उन्होंने आम आदमी पार्टी से गठबंधन के लिए कहा है। जबकि यह तथ्य है की पूरे हरियाणा में आम आदमी पार्टी को पिछले चुनाव में एक प्रतिशत से भी कम वोट मिले थे, हां कुरुक्षेत्र लोकसभा चुनाव में जो कि वह केवल एक ही सीट पर लड़ी थी, जरूर कुछ विधानसभाओं में उसकी बढ़त रही थी। जबकि उसका गठबंधन कांग्रेस के साथ ही था।  कुरुक्षेत्र से जो बात निकल कर आ रही है,उसके अनुसार अगर वहां कांग्रेस का अपना कैंडिडेट होता और उसका आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन न होता तो शायद कांग्रेस हरियाणा में पांच के बजाय 6 सीटों पर जीत दर्ज कर सकती थी। मतलब यही निकलता है की आम आदमी पार्टी की वजह से कांग्रेस ने एक सीट गंवाई। 

या तो राहुल के सलाहकारों ने उनके सामने यह खाका  पेश किया है की आम आदमी पार्टी की वजह से उन्हें हरियाणा लोकसभा में  5 सीटों पर जीत मिली, या राहुल की राजनीती इससे अलग सोच पर काम कर रही है। राहुल गांधी की इस रणनीति को समझना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने एक चार सदस्यीय कमिटी का गठन भी किया है जो सीटों के बंटवारे पर विचार करेगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह बयान कांग्रेस की भीतरखानी की राजनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद भूपेंद्र सिंह हुड्डा की स्थिति को कमजोर करना है? राहुल गांधी की जाति आधारित राजनीति भी इस रणनीति का हिस्सा लगती है। उन्होंने लगातार जाति जनगणना और दलितों को उनका अधिकार दिलाने की बात की है, जो दलितों के बीच उनकी छवि को मजबूत करने के लिए किया गया एक प्रयास है। हरियाणा में एक दलित मुख्यमंत्री बनाने का संदेश यही होगा कि कांग्रेस दलित हितैषी है, जिससे राहुल गांधी को 2029 के चुनावों में फायदा मिल सकता है।

अब इसी पर बात भी कर लेते हैं । राहुल गांधी के लीडर ऑफ अपोजिशन बनने से पहले ही, वह लगातार देश में जाति जनगणना की तथा जातियों के आधार पर उन्हें उन्हें उनका हक देने की बात करते रहे हैं। लोकसभा चुनाव भी उन्होंने इसी एजेंडे पर लड़ा था। लोकसभा चुनावों से पूर्व राहुल गांधी और उनके सहयोगी इंडि गठबंधन ने संविधान खतरे में है,यह कहकर अनुसूचित और ओबीसी जातियों में यह डर फैलाया कि अगर मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो संविधान बदल देंगे। अनुसूचित जातियों का आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा। राहुल गाँधी इस प्रोपेगेंडा में अगुआ नजर आए। राहुल और उनके इंडि गठबंधन के सहयोगी दल के नेता अपने हाथों में लगातार लाल रंग की छोटी सी कोई किताब लेकर जिसे वो संविधान बता रहे थे,लोकसभा चुनाव में घूमते रहे। चुनाव में इसका फायदा भी कांग्रेस को मिला। दलितों का वोट हासिल करने में वो सफल भी रहे। यूपी जैसे राज्यों में तो ऐसा लगता है जैसे दलितों के साथ साथ पिछड़ी जातियों ने भी उन पर विश्वास कर वोट दिया। यही कारण रहा की उनकी सीटें बढ़कर 99 पर जा पहुंची तथा भाजपा 240 सीटों पर ही सिमट गई। हालांकि एनडीए गठबंधन की बदौलत मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे। लीडर ऑफ अपोज़ीशन बनने के बाद भी राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को हवा देना तब तक जारी रखा जब तक जातीयता की बात खुद उनके खिलाफ जाते दिखाई नहीं दी। 

बात चाहे लोकसभा में तस्वीरों को लहराने की हो, जिसमें एक तस्वीर दिखाकर राहुल गाँधी ने पूछा कि इसमें कितने दलित या ओबीसी हैं। बता दे  कि वह तस्वीर बजट पेश करने से पूर्व हलवा सेरेमनी की थी, जिसमें बजट बनाने से संबंधित अधिकारी और कर्मचारी मौजूद थे। उनका कहना था कि बजट बनाने वालों में कोई दलित अधिकारी क्यों नहीं है। इस पूरे प्रकरण ने काफी तूल पकड़ा और बात खुद राहुल गांधी की जाति तक जा पहुंची थी। अनुराग ठाकुर ने सीधे-सीधे राहुल गांधी से उनकी जाति नहीं पूछी थी। इसके बावजूद उनके साथ बैठे समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने यह कहकर पुरजोर विरोध किया कि वह अनुराग ठाकुर राहुल गाँधी की जाति कैसे पूछ सकते है। जबकि तथ्य यह है की राहुल गाँधी और अखिलेश यादव ने लगातार लोगों से खासतौर पर मीडिया कर्मियों से उनसे सवाल करने पर उनकी जाति पूछ रहे थे।  ध्यान देंगे तो पाएंगे की मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से धीरे-धीरे राहुल गांधी और उनके सहयोगी नेताओं के हाथों से वह छोटी सी डायरीनुमा किताब जिसे वह संविधान बताते थे गायब हो गई है। राहुल यह जरूर समझ गए हैं कि ऐसे प्रोपेगेंडा की मदद से वह अगर 99 सीट पा सकते हैं तो 2029 में प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं। इसके लिए कांग्रेस का इतिहास कुख्यात रहा है। कांग्रेस के गठन से लेकर अब तक समय समय पर कांग्रेस नेताओं ने ऐसे नारे गढ़ें हैं जिनके भुलावे में टूटी थाली में  एक समय खाना खा सकने वाली देश की गरीब आम जनता ने बार-बार गाँधी परिवार को प्रधानमंत्री पद सोने की थाली में परोसकर दिया है। राहुल उसी नक़्शे कदम पर चल रहे हैं। इन्हीं तरीकों से वो 2029 में प्रधानमंत्री पद पाना चाहते हैं। जाति जनगणना उसी रास्ते का एक मोहरा मात्र है। इसके लिए हरियाणा में बहुमत की सरकार बनाना तथा हरियाणा कांग्रेस का बड़ा दलित चेहरा कुमारी शैलजा को मुख्यमंत्री बनाना ही उनका हरियाणा में पहला पड़ाव होगा। भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस बात से अनजान होंगे, मुझे तो ऐसा कतई नहीं लगता। शैलजा भी खुलकर यह कह चुकी है कि वह सीएम पद की दौड़ में है। कांग्रेस प्रभारी बाबरिया ने जब कहा कि सीटिंग सांसद यह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे तो अगले ही दिन उन्हें कहना पड़ा की इसका फैसला पार्टी हाई कमान यानी सोनिया गांधी या राहुल गांधी करेंगे।  इस पुरे प्रकरण के सिरों को जो अलग अलग दीखते है,जोड़ा जाए तो कहानी स्पष्ट है। अगर कांग्रेस पूर्ण बहुमत लाने में सफल रही तो भूपेंद्र सिंह हुड्डा का साइड लाइन लगना और कुमारी शैलजा का मुख्यमंत्री बनना तय है। कांग्रेस का बहुमत हासिल करना इसलिए भी जरूरी है कि अगर कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से एक दो सीट भी पीछड़ गई तो 5 साल सरकार चलाना सैलजा के लिए मुश्किल होगा। गाँधी परिवार नहीं चाहेगा की ऐसी स्थिति से भाजपा लाभ ले। आप यह भी सोच रहे होंगे इससे तो कांग्रेस का कोर जाट वाटर नाराज हो जाएगा तो याद दिला दूं कि जब भजन लाल 2005 में 60 से ज्यादा सीट लेकर आए थे तो उन्हें हटाकर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बना दिया गया था। उस समय भूपेंद्र सिंह हुड्डा सांसद थे। उन्हें विधानसभा का चुनाव भी नहीं लड़वाया गया था। कोई सोच भी नहीं रहा था कि इतनी बड़ी जीत मिलने के बाद भी भजनलाल को हटाया जाएगा। लेकिन भजनलाल को दरकिनार कर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया गया। आप कह सकते हैं की हुड्डा तो खुद भी जाट थे इसलिए फर्क नहीं पड़ा।  तो उसके लिए अगले पांच साल काफी हैं। भजनलाल और हुड्डा के पुराने उदाहरणों से साफ है कि कांग्रेस का इतिहास इस प्रकार के फैसलों से भरा पड़ा है। इस बार तो बात दलित वोटों की है। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की है। इसके लिए दलितों के बीच यह राजनीतिक मैसेज पहुंचाना जरूरी है, कि कैसे राहुल गांधी ने हरियाणा में जाट बहुल प्रदेश में एक दलित को मुख्यमंत्री बना दिया।  वह कितने बड़े दलित हितैषी हैं। सैलजा के मुख्यमंत्री बनने से दलितों का फायदा कैसे होगा, होगा भी या नहीं होगा पता नहीं। 

देखना यह होगा कि भाजपा इस बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का कैसे सामना करती है। क्या वह राहुल गांधी की इस चाल का फायदा उठा पाएगी, या कांग्रेस की यह नई रणनीति उसे मात देगी?