मजबूर व मजदूर पत्रकार स्वतंत्र लिखना भी चाहेगा तो रोजगार जाने के डर से रुक जाती है कलम.

हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर वरिष्ठ पत्रकार, हमारे प्रेरणा स्त्रोत, मार्गदर्शक, समय-समय पर हमें पत्रकारिता के संदर्भ में आईना दिखाने का काम करते रहते हैं। आज के समय में पत्रकारिता केवल पैसे के लिए होती है, नाकि समाज भलाई के लिए। मीडिया के 95 प्रतिशत चैनल और अखबारों पर पूंजीपति घरानों या राजनेताओं का कब्जा है। रही बात पत्रकारों की, वो केवल मालिको के इशारे पर चलते है, उनकी कलम बंधुआ मजदूर की तरह है, जैसा मालिक चाहेगा वैसा ही लिखा जाएगा। यदि थोड़ा सा भी खिलाफ लिखने की हिम्मत की तो नौकरी पर तलवार लटकती नजर आती है, इसलिए वो मजबूर व मजदूर पत्रकार जो स्वतंत्र लिखना भी चाहेगा तो रोजगार जाने के डर से अपनी कलम रोक लेता है क्योंकि उसको आगे कोई रोजगार नही दिखाई देता और भविष्य अंधकारमय नजर आता है। दूसरी बात मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में होने के कारण पूंजीपति को केवल विज्ञापन का पैसा चाहिये। यदि हम किसी से विज्ञापन लेंगे तो उसके खिलाफ नही लिख पाएंगे और यदि लिखेंगे तो मालिक का डंडा चल सकता है। पत्रकारिता वही सच्ची पत्रकारिता है जो समाज हित की हो, समाज को उसके अधिकार और न्याय अन्याय की लड़ाई में न्याय दिलवा सके। उन्होंने बताया कि आज प्रतिष्ठित टीवी चैनलों की माइक आईडी बाजारों चूड़ियां बन चुकी हैं, कभी एक रिपोर्टर के हाथ में तो कभी दूसरे रिपोर्टर के हाथ में। वह माइक आईडी रातों-रात कब किस रिपोर्टर के हाथ में चली जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है। अगर एक रिपोर्टर किसी चैनल से सैलरी अथवा खबरों के बदले पैसे ले रहा हो तो दूसरा रिपोर्टर उस चैनल में जाकर यह बोल दे कि मैं आपसे पैसे लूंगा नहीं बल्कि आपको हर महीने हजारों/लाखों रुपयों का विज्ञापन दूंगा तो चैनल के संपादक अथवा मालिक उस सेलरी लेने वाले रिपोर्टर को फोन या ईमेल करके यह बोल देते हैं कि कल से आपको खबर भेजने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमने दूसरा रिपोर्टर रख लिया है। जो व्यक्ति बिना चैनल से सैलरी लिए उल्टा चैनल को हजारों/लाखों रुपए का विज्ञापन देगा तो सीधी सी बात है कि वह उस मीडिया/माइक आईडी का गलत उपयोग ही करेगा लेकिन उस चैनल के मालिक और संपादक यह जानकर भी अनजान बन जाते हैं क्योंकि उनके लिए सब कुछ पैसा होता है।

लेखक : कृष्ण प्रजापति कैथल से रिपोर्टर हैं।