भारतीय क्रिकेट टीम की शर्मनाक हार से, शर्मनाक खेल के मायने से नहीं बल्कि भारतीय मीडिया के उस नजरिए से है जो कई दिन पहले से ही भारत की जीत को एकतरफा बता रहा था। भारतीय क्रिकेट टीम को अजेय बता रहा था। संसार भर में केवल भारतीय मीडिया एक ऐसा भांड पत्रकारिता का अभियान चला रहा है, जिसकी वजह से भारत को अनेकों बार शर्मसार होना पड़ता है।
व्यक्तिगत तौर पर अगर आप इस क्रिकेट मैच पर मेरा विचार जानना चाहे, तो मैं भारत और पाकिस्तान क्रिकेट के बीच का मैच ना होने के पक्ष में था। इसके पीछे कोई नफरत नहीं बल्कि वह गुस्सा था, जो पाकिस्तान प्रयोजित आतंकवाद को लेकर था।
भारत सरकार बार-बार कहती रही है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकती। लेकिन उसका कहने का मतलब शायद यह था कि क्रिकेट हो सकता है। हो सकता है ।
भारत सरकार की पाकिस्तान और भारत का क्रिकेट मैच करवाना कोई विदेश नीति की मजबूरी रही हो। लेकिन ज्यादातर भारतीय इस मैच के पक्ष में सिर्फ इसलिए थे, क्योंकि मीडिया ने उनके दिमाग में बिठा दिया था कि भारत तो अजेय है। पाकिस्तान के लिए भारतीय टीम को हरा पाना नामुमकिन है। वो तो सिर्फ पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की हार को सेलिब्रेट करना चाहते थे। पाकिस्तान की हार हर मोर्चे पर चाहते थे। लेकिन विराट कोहली की टीम के अति आत्मविश्वास ने यह अवसर इस बार पाकिस्तान को ख़ुशी- ख़ुशी दे दिया। हारने पर भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली ने खेल भावना से बाबर आजम को जीत की बधाई दी।
लेकिन एक मायने में भारतीय क्रिकेट टीम का यह मैच हारना उन पाकिस्तानियों या साफ़ शब्दों में कहें तो उन जिहादियों का नकाब उतारने में कामयाब रहा जो अखंड हिंदुस्तान को 1947 में धर्म के आधार पर बाँटने के बावजूद एक षड्यंत्र के तहत भारत में ही रहा। जहाँ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दू ख़त्म किया गया वहीं हिंदुस्तान में इनकी तादाद दस गुना बढ़ाई गई । इसका श्रेय नेहरू से लेकर राजीव तक के शासन को पूर्ण रूप से दिया जा सकता है। जहाँ हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाया गया वहीँ मुस्लिमों के लिए बंटवारे के बाद भी शरिया लागु रहा।
साफ़ नजर आता है की सेकुलरिज्म का पट्टा हिन्दुओं के गले में डाल कर उन्हें अब तक बरगलाया जा रहा था।
बीजेपी सरकार के कुछ क़दमों राम मंदिर,धारा 370,35 ए और सीएए जैसे क़दमों ने ही गाँधी परिवार के एजेंडे को रोक दिया जिससे इनकी बौखलाहट हिन्दुओं के सामने खुलकर आ गई है।
पाकिस्तान की धमाकेदार जीत के साथ ही भारत के कई राज्यों में भी धुआंधार दिवाली के पटाखे छोड़े गए। अब यह पटाखे किसी गैर मुस्लिम व्यक्ति ने छोड़े हो तो खेल भावना समझी जा सकती है, लेकिन भारत पर पाकिस्तान की जीत का जश्न एक खास तबके के नौजवानों द्वारा मनाया गया ,जैसे बाबर ने दोबारा हिंदुस्तान फतह कर लिया हो।
कश्मीर के साथ-साथ भारत के अनेक राज्यों में भारतीय क्रिकेट टीम की हार पर जब पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए पटाखे फोड़े गए तब स्थानीय पुलिस द्वारा से युवकों को हिरासत में लिया गया। इससे छटपटा कर पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने यहां तक कह दिया कि पाक की जीत पर जश्न मनाने वालों के खिलाफ गुस्सा क्यों ? कुछ लोग देश के गद्दारों को गोली मारो जैसे जान लागे जानलेवा नारे भी लगा रहे हैं। कोई यह भूल नहीं सकता कि जम्मू कश्मीर से विशेष दर्जा छीनने पर देश भर में मिठाइयां बांटी गई थी।
वहीं दूसरी ओर ड्रग्स केस में फंसे शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की कस्टडी को लेकर नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी समीर वानखेड़े पर महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नवाब मलिक लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि शाहरुख खान के बेटे को जानबूझकर फंसाया जा रहा है। उनके अनुसार यह छापेमारी फर्जी थी। एनसीबी को क्रूज़ पर कोई ड्रग्स नहीं मिला और कहा कि अगला निशाना शाहरुख खान है। नवाब मलिक ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा पूरे एनसीबी का इस्तेमाल महाराष्ट्र सरकार और बॉलीवुड को बदनाम करने के लिए कर रही है। एनसीबी उन लोगों को निशाना बना रही है जो भगवा दल के खिलाफ है। भाजपा ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अगर कोई सबूत ना होता तो शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को अब तक जमानत मिल गई होती। एनसीबी इस मामले में आर्यन खान समेत कुल 17 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है।
जबकी नवाब मलिक के आरोपों को देखा जाए तो उनका इशारा साफ तौर पर यह है कि, भाजपा केंद्रीय एजेंसियों के द्वारा मुसलमानों को टारगेट कर रही है। 13 जनवरी 2021 को ही एनसीबी ने नवाब मलिक के दमाद समीर खान को मादक पदार्थों के मामले में ही गिरफ्तार किया था। यह भी गौरतलब है कि उनके दमाद को सितंबर में ही जमानत पर रिहा किया गया है।
क्रिकेट से लेकर ड्रग्स मामले में सब कुछ वही हो रहा है जो 1947 से लेकर आज तक चलता आ रहा है यानी जिहाद !

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