एलोपैथी दवाओं और डॉक्टरों पर कथित बाबा रामदेव के द्वारा कि गई टिप्पणी  का डॉक्टरों की संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने ना केवल जोरदार विरोध किया है बल्कि, सरकार को यह तक कह दिया है कि वह या तो बाबा रामदेव की बात माने या फिर एलोपैथी से इलाज कर रहे डॉक्टरों की। बेशक, इसको नकारा नहीं जा सकताकीआधुनिक चिकित्सा में एलोपैथी जीवनदायिनी होने के साथ-साथ लोगों को तुरंत आराम भी पहुंचा रही है, लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है- अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्था डब्ल्यूएचओ के अनुसार करोना से मृत्यु दर कितनी है, इसे निकालने के कुछ फार्मूले हैं, जैसे करोना से जूझ रहे व्यक्ति की मौत किसी और बीमारी से भी हो सकती है और उसकी मौत कोरोना से भी हो सकती है। दोनों के लिए अलग-अलग फार्मूले अपनाए जाते हैं, इसी प्रकार उसने समय समय पर कोरोना के इलाज में प्रभावी दवाओं को अपनी गाइडलाइन्स में शामिल किया है तथा अप्रभावी दवाओं को बाहर।  लेकिन भारत जैसे देश में जहां प्रशासन और सरकारों के ऊपर कोरोना से मृत्यु के आंकड़े छुपाए जाने के आरोप लग रहे हों, उस देश के स्वास्थ्य मंत्री का यह कहना कि कोरोना से मृत्यु दर सिर्फ 1.13% और रिकवरी रेट 88% से अधिक है और इसके लिए एलोपैथिक दवाएं और उसके डॉक्टरों का अहम रोल है, भारत की जनता से आपदा में हास्य करने के समान है। आप मुझसे "आपदा में हास्य वाक्य"  को लेकर असहमत हो सकते हैं,लेकिन इस आपदा में जब देश की जनता से धरती के यह एलोपैथिक भगवान आपदा को अवसर मानकर अपनी जेबे भरने में लगे हुए हैं, यह कहना कि देश की जनता इनके साथ है, गलत होगा। बेशक सभी एलोपैथिक डॉक्टरों के लिए मैं यह नहीं कह सकता,लेकिन अधिकांश के लिए यह महामारी आपदा में अवसर साबित हो रही है। 

मेरे लिए, आर्मी के मेजर जनरल डॉक्टर वीके सिन्हा का भारत की प्रमुख स्वास्थ्य संस्था एम्स के प्रमुख डॉक्टर रणदीप गुलेरिया को कोरोना कि बार-बार बदलती गाइडलाइंस पर लिखा पत्र संदेह उत्पन्न करता है, कि कहीं इसके पीछे दवा माफिया तो नहीं ? 

आर्मी डॉ वीके सिन्हा ने AIIMS प्रमुख गुलेरिया से पूछा है कि एम्स द्वारा कोरोना के इलाज में बार-बार गाइडलाइन बदलने ने लोगों की जान और माल दोनों का नुकसान पहुंचाया है।  उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि, एम्स द्वारा समय-समय पर गाइडलाइन में परिवर्तन किया गया और कहा गया कि पिछला गाइडलाइन अधिक प्रभावी नहीं था।

 यदि डॉक्टर सिन्हा के सवाल को आधार बना लिया जाए तो, डॉ. गुलेरिया को देश के सामने यह बताना चाहिए कि उन्होंने किन आधारों को मानक मानकर एम्स की गाइडलाइन्स  तैयार की और डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन को आधार क्यों नहीं बनाया ? जिन दवाओं को डब्ल्यूएचओ पहले ही अप्रभावी बता चुका था, उन्हें इलाज में क्यों शामिल किया गया ? मेजर जनरल डॉ वीके सिन्हा आइवरमेक्टिन इंजेक्शन दिए जाने के निर्देश पर भी सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं कि, 7 अप्रैल 2021 को जारी निर्देश में आईवरमैक्टीन देने की बात देश भर के डॉक्टरों ने मानी जबकि डब्ल्यूएचओ इससे पूर्व  पिछले साल नवंबर में ही इसे कोरोना में प्रभावी दवाओं की सूची से हटा चुका था। 

मेजर जनरल डॉ सिन्हा के अनुसार देश की राजधानी से लेकर गांव तक डॉक्टर स्टेरॉइड लिख रहे हैं, जिसके परिणाम स्वरूप बैक्टीरिया और फंगस  संक्रमण के रूप में जानलेवा परिणाम सामने आ रहे हैं। 

क्या सेना के चिकित्सक मेजर जनरल डीके सिन्हा की सवालों का जवाब एलोपैथी चिकित्सक देश को देंगे ? या,  देश की जनता यह मान ले कि देश में एलोपैथिक चिकित्सा स्टूपिड नहीं, देश के एलोपैथिक चिकित्सक की नजरों में देश की जनता बेवकूफ हैं ?