भारत के अनेक राज्यों में वामपंथी उग्रवाद की चरम समस्या अब उतरने को है। दशकों से देश के दूरदराज के वह क्षेत्र जहां संचार साधनों का अभाव था, वामपंथी उग्रवादी संगठनों का सक्रिय गढ़ बन चुके थे। 2004 में पीपल्स वार ग्रुप जो पहले आंध्र प्रदेश में सक्रिय था तथा माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया जो बिहार और उसके पड़ोसी क्षेत्रों में सक्रिय था, को एक करके सीपीआई (माओवादी) पार्टी बनाई गई। सीपीआई (माओवादी) पार्टी नागरिकों और सुरक्षा बलों की हत्या की अधिकांश घटनाओं के लिए प्रमुख तौर पर जिम्मेदार है। सरकार ने सीपीआई (माओवादी) पार्टी तथा इससे जुड़े गुटों और प्रमुख संगठनों को विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 1967 के द्वारा आतंकवादी संगठनों की अनुसूची में शामिल किया है। सीपीआई (माओवादी) और इससे जुड़े गुटों और संगठनों का सिद्धांत एक ही है कि, भारत की सरकार को हटाने और अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए सशस्त्र विद्रोह। इन संगठनों का भारत के संविधान में कोई विश्वास नहीं है और वह सत्ता को हिंसा और ससस्त्र विद्रोह के साथ पाना ही लक्ष्य मानते हैं।
 भारत सरकार ने कई बार इन संगठनों को हिंसा छोड़, बातचीत की मेज पर बुलाने का प्रयत्न किया,जिसे इन संगठनों ने हर बार नकार दिया। इन आतंकवादी संगठनों का मुख्य निशाना आदिवासी और निर्धन तथा पिछड़े वर्ग के गरीब लोग ही रहते हैं। 
2004 से लेकर 2018 तक भारत के विभिन्न भागों में इन वामपंथी आतंकियों द्वारा 7907 लोगों की हत्या की गई है, मारे गए अधिकांश नागरिक आदिवासी हैं, जिन्हें निर्दयता पूर्वक मारे जाने से पहले यातनाएं भी दी गई है। हास्यास्पद बात यह है कि यह आतंकवादी वामपंथी संगठन मारे जाने वाले लोगों को पुलिस मुखबिर बताते हैं और दूसरी तरफ इनका प्रचार एक ही होता है कि वह आदिवासी और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के हितेषी हैं, जिनके समर्थन में यह सशस्त्र विद्रोह किया जा रहा है। पर वास्तव में इनकी विचारधारा डर फैला कर गरीब आदिवासियों को अपनी तरफ होने पर मजबूर करना तथा भारत की संघीय व्यवस्था को चोट पहुंचाना है। स्थानीय सरकारी अधिकारीयों, पुलिसकर्मियों और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या के साथ-साथ पंचायतों के जनप्रतिनिधियों की हत्या इनकी योजना का एक बड़ा हिस्सा होते हैं जो इनके दुष्प्रचार को बढ़ावा देने में सहयोग देते हैं। 
स्थानीय शासन में खालीपन भर जाने पर जो सुविधाएं भारत सरकार पंचायती स्तर तक इन नागरिकों तक पहुंचा सकती थी, उन्हें अवरुद्ध कर भारत सरकार के विरुद्ध स्थानीय गरीब आदिवासी लोगों में यह भावना भरी जाती है कि उनके हर दुखों का कारण भारत सरकार की ऐसी नीतियां ही है। 
यह भी एक तथ्य है कि इन आतंकवादी वामपंथी संगठनों को विदेशी शक्तियों द्वारा पोषित किया जाता है। देश के अनेक बुद्धिजीवी समय-समय पर पकड़ में आते रहे हैं। खासतौर पर पत्रकार और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े महानुभाव ही अधिकतर वामपंथ आतंकवाद की जड़ में पोषण का काम करते पाए जाते हैं। 
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय काफी लंबे समय से वामपंथी विचारधारा की पोषक नगरी के रूप में विख्यात है। वर्तमान में जामिया मिलिया इस्लामिया जो कभी भारत में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की पोषक रही थी अब सीएए के मसले पर लगातार मुखर होती जा रही है। अनेक दूसरी युनिवर्सिटी मे भी वामपंथियों की विचारधारा की गूंज सुनाई देने लगी है। इसका प्रत्यक्ष एक ही कारण नजर आता है और वह यह है कि भारत सरकार ने देश के 11 राज्यों के वामपंथी आतंकवादी संगठनों पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी है। इन जगहों पर अपनी पकड़ कमजोर पड़ते देख वामपंथी बुद्धिजीवी आतंकवादियों ने अपने प्रचार और प्रसार का क्षेत्र अब इन यूनिवर्सिटीओं में खुलकर शुरू कर दिया है। सरजील इमाम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जिन का शिकार वह भोले भाले विद्यार्थी हो रहे हैं, जिन्हें माओवादी आतंकवाद की भयावहता का वास्तविक अंदाजा भी नहीं है।
 देश के कई राजनीतिक दल भी इन विद्यार्थियों के कंधों का सहारा लेकर सत्ता हासिल करने की ललक में, देश में फैल रही अराजकता को अनदेखा करने पर तुले हैं। जिसके पीछे निस्संदेह उन विदेशी ताकतों का हाथ है, जो विकसित होते राष्ट्रों को पीछे धकेलने का हर संभव प्रयास करते है। 
अब समय की मांग है "भारत के प्रबुद्ध राष्ट्रवादी नागरिकों" से जिनके लिए धर्म, जाति या वर्ण से पहले देश है। उन्हें आगे आकर इस अर्बन वामपंथी आतंकवाद के आगे खड़ा होना होगा। वर्ना वह समय दूर नहीं जब भारत गृह-युद्ध से जूझ रहा होगा।