पतित पावनी मां गंगा की यात्रा का वर्णन

त्तरकाशी चारों तरफ ऊंचे ऊंचे पर्वतों से घिरी हुई, इन पर्वतों बीच से गंगाजी बहती है । मैं ऊंचे-ऊंचे पर्वतों पर गया हूं । इसलिए इन पर्वतों के बारे में लिखने का मन करता है । जिन-जिन पर्वतों पर गया हूं, उन सब के बारे में कुछ ना कुछ अपना अनुभव जरूर लिखूंगा । ताकि इसको पढ़ने के बाद आप का भी मन एक बार जरूर करे घूमने के लिए, इन पवित्र पर्वतों के बीच । 

डोडीताल

डोडीताल का मनोरम दृश्य 
अभी डोडीताल का झरना आया तो मैं उस पर ही अटक गया हूं । इस विशाल झील का स्वच्छ जल देवदार, चीड़ और पलाश के वनों से घिरा है। इस जंगल में विभिन्न प्रकार के हिंसक पशु भी पाए जाते हैं। कल्याणी से सात कि.मी. दूर अगोडा नामक गांव है जहां टैंट आदि की सुविधाएं हैं। वहां से 18 कि.मी. दूर पैदल मार्ग से चलकर झील तक पहुंचा जा सकता है। डोडीताल की गहराई अथाह है। डोडीताल है ही बहुत सुंदर ! डोडी ताल कहिये या सरोवर अथवा झील । इस सरोवर में रंग-बिरंगी मछलियां हैं । सरोवर के पास संतों की कुटिया भी है । यहां पर रहने वाले अपने आप को स्वर्ग में रहने के समान मानते हैं । डोडीताल उत्तराखंड के शहर उत्तरकाशी में गंगोत्री सड़क मार्ग से 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जो लगभग 3020 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । स्वच्छ व निर्मल जल से परिपूर्ण यह सरोवर चारों ओर से घने वनों से लदा हुआ है। 
श्रीगणेश का जन्म हुआ
 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां भगवान श्रीगणेश का जन्म हुआ था। डोडीताल में मां अन्नपूर्णा का सदियों पुराना मंदिर है। यहां मां पार्वती की पूजा मां अन्नपूर्णा के रूप में की जाती है। 
यह भी कहा जाता है कि अन्नपूर्णा मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन के बाद चार-धाम यात्रा बाधा रहित संपन्न हो जाती है। डोडीताल को माता पार्वती का स्नान स्थल माना जाता है। माता पार्वती एक बार जब स्नान के लिए जा रही थी तो उन्होंने बाल गणेश को कह दिया कि किसी को अंदर न आने दें। बाल गणेश पहरेदारी कर रहे थे कि भगवान शिव आ पहुंचे। बाल गणेश ने भगवान शिव को रोका तो भगवान शिव ने क्रोध में आकर बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। 
माता पार्वती ने जब यह देखा तो भगवान शिव को बताया कि ये तो आपका ही पुत्र है और मेरी ही आज्ञा का पालन कर रहा था। आप इसे जीवित कीजिए। फिर भगवान शिव ने हाथी के बच्चे का सिर बाल गणेश के धड़ से जोड़ दिया। पुराणों के अनुसार ये घटना डोडीताल में ही हुई थी। संत बताते हैं यहां मातृकाएं रहती है, ऊंची आवाज में बोलने से यहां पर मल मूत्र त्याग करने से कठिनाई होने लगती है । संत बताते हैं यहां ऐसे पक्षी है जो इस झील को स्वच्छ रखते हैं । कोई तिनका भी गिर जाए तो तुरंत उसे हटा देते हैं । अस्सी गंगा यहीं डोडीताल से निकलती है और भगीरथी में मिलती है।जिसका संगम उत्तरकाशी यानी गंगोरी में होता है । डोडीताल पर एक तरफ गंगा जी की घाटी है तो दूसरी तरफ यमुनोत्री की घाटी है । पूरा गढ़वाल क्षेत्र और अधिकतर उत्तराखंड सनातन काल से ही ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा है । 

संतो की सेवा 

सन 2006 से ही यहां पर रह रहे संतों के लिए राशन पानीपत से आता है। उत्तरकाशी और उत्तरकाशी से डोडीताल स्वामी हरिदास जी ने शुरू किया था और आज कल यह सेवा माधव भट्ट उत्तरकाशी वाले निभा रहे हैं । हम पानीपत से जो राशन भंडारे के रूप में ले जाते हैं उस राशन में से कुछ राशन हम उत्तरकाशी भी देते हैं । जो संत आसपास की ऊंची चोटी पर रहकर साधना करते हैं, माधव भट्ट जी वह राशन उन संतो तक पहुंचाते हैं । जो संत नजदीक होते हैं, उनको हम स्वयं देकर आते हैं और दूर के संतों की सेवा माधव जी करते हैं । माधव भट्ट जी पतंजलि उत्तरकाशी में गोमूत्र प्लांट के मैनेजर हैं । उनके पास जो एक्स्ट्रा टाइम होता है, उस टाइम में संतों की सेवा करते हैं और संतों का आशीर्वाद भी लेते हैं । उत्तरकाशी में और भी अनेक पर्वत हैं । 

नचिकेता ताल

उत्तरकाशी से कुछ दूर पर ही नचिकेता ताल है और श्री हरि महाराज का पर्वत है । नचिकेता ताल भी अत्यंत ही रमणीक स्थल है कहते हैं कि, ऋषि वाजश्रवा के पुत्र नचिकेता ने इस ताल का निर्माण किया था। नचिकेता ने यमलोक में जाकर यम से 2 वर मांगे। उन्होने पूछा कि, मैं कौन हूँ और मृत्यु के बाद जीव की गति क्या होती है ? यम ने उन्हें कई प्रलोभन दिये। तुम बालक हो ! तुम्हें इससे क्या लेना देना। मैं तुम्हें दीर्घायु देता हूँ। असीम सम्पति देता हूं , सुन्दरियाँ प्रदान करता हूं। इन सब का भोग करो। किंतु बालक अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ था। सशरीर मृत लोक से यमलोक रहा था । हठ यही कि इन प्रश्नों का उत्तर जानकर रहूंगा ।2 दिन तक यमराज के द्वार पर पड़े रहे । तब जाकर दो वर मिले । यम ने उन्हे ब्रह्मविद्या एवं आध्यात्मिक विद्या का उपदेश दिया था। वह मृत्युलोक से सशरीर स्वर्ग गए थे । केदारखंड में इसका अत्यंत सुंदर कथा का वर्णन किया गया है और हमें एक संत स्वामी कृष्णा दास जी ने बताया कि इसी ताल पर प्रतिदिन शाम के समय शेर पानी पीने के लिए आता है । मुझे भी सन 2000 में नचिकेता ताल जाने का मौका मिला । मैं उत्तरकाशी से साडा गांव गया। गांव से नचिकेता ताल गया मेरे साथ एक गाइड था ।जिसका नाम मदन था। मदन साडे गांव का रहने वाला था। वह मेरे साथ था ।मदन गंगोत्री में मुझे मिला था। वह गंगोत्री में गाइड का काम करता था। मैने उस से इस बात का जिक्र किया तो उसने कहा, यह बात सत्य है ।वहां पर प्रतिदिन शेर पानी पीने आता है । मैंने कहा मुझे वहां जाना है । वह कहने लगा, मैं आपके साथ चलूंगा । जब मैं उसके साथ नचिकेता ताल गया और देखा घोर जंगलों के बीच नचिकेता ताल है । पहले मैंने उस ताल की परिक्रमा की । फिर उसके जल में हाथ-मुँह धोया। फिर मन में इच्छा हुई कि आज शाम को यहां रह कर शेर देखते हैं । ऐसा नहीं हो पाया, कुछ ही समय में वहां पर तेज आंधी चलने शुरू हो गई और धीरे-धीरे बारिश भी शुरू हो गई ।वहां पर एक संत की कुटिया थी। हम वहां पर बैठे। संत जी वहां पर नहीं थे । कुछ ही देर में कुटिया में से भी बरसात का पानी आना शुरू हो गया । शाम भी ढ़लने लगी और कुछ-कुछ डर भी लगने लगा। उस जंगल में लाइट का तो कोई नामोनिशान नहीं था । हमने वापस चलने का फैसला किया । उस घनघोर जंगल से वापस आना तो मुझे ही पता है। जैसे-तैसे करके हम दोनों वापस आए और ऊपर से बरसात भी आ रही थी । 3 किलोमीटर का रास्ता हमने1 घंटे में तय किया और उसके गांव आ गए । रात काफी हो चुकी थी । रात के 8:00 बज गए थे । वहां आकर हमने कपड़े बदले और आग के आगे हाथ सेंके और खाना खाया और बातें करते-करते नींद आने लगी । अगले दिन हम दोनों को हरि महाराज के पर्वत पर भी जाना था । मौसम ठंडा था ।वहां पर गांव में लाइट नहीं थी । क्योंकि दिन में काफी पैदल चल चुके थे, इसलिए थोड़ी देर में नींद आ गई। अगले दिन हम प्रातः उठे और पास में ही एक सुंदर से झरने पर नहा कर आए। इतने में हमारे लिए नाश्ता तैयार हो गया था ।हमने नाश्ता किया और हरि महाराज जी के पर्वत की ओर चल दिए । उस रास्ते पर कम ही लोग जाते थे ।जब कोई विपति में होता था, तभी कोई जाता था । गांव में वर्षा नहीं होती तो, सभी गांव के पुरुष लोग इकट्ठे होकर जाते थे । अपनी मन्नत मांगने के लिए की गांव में वर्षा हो। कहते हैं कि, जब तक गांव के लोग गांव में वापस आ जाते हैं तो उसी रात वर्षा हो जाती थी। दूसरी बात हरि महाराज जी के पर्वत पर महिलाओं का जाना वर्जित था । यह पर्वत भगवान शिव के बड़े पुत्र श्री कार्तिकेय महाराज के नाम से जाना जाता है..... क्रमश . 

उमा कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना

अशोक कैलाशी