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| दिल्ली में हुई हिंसा |
1946 में मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग को लेकर 'डायरेक्ट एक्शन डे' घोषित किया। उनका कहना था या तो भारत बंटेगा या खत्म होगा। बंटवारे के बाद जो हिंसा हुई उस पर उनके सचिव ने कहा था कि, जिन्ना नहीं जानते थे इतनी हिंसा होगी जिसमें लाखों लाख लोग बेघर होंगे और लाखों लोग ही मारे जाएंगे। उनके सचिव कि इस बात से एक बात तो साबित होती है कि जिन्ना का एकमात्र मकसद 'कायदे आजम' बनना था, जो उन्होंने भारत का बंटवारा कर पा लिया। 1947 के बाद आज वही परिस्थितियां भारत में वामपंथी-सेक्यूलर पार्टियां पैदा कर रही है। तीन तलाक और कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति के बाद जो काम यह लोग नहीं कर पाए, वही काम सिटिजन अमेंडमेंट बिल ने इनके लिए आसान कर दिया। संसद के दोनों सदनों में इस बिल पर भरपूर चर्चा हुई। सरकार ने विपक्ष के हर सवाल का जवाब दिया। विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल यह था कि यह मुस्लिम विरोधी बिल है, इससे भारत के मुस्लिम प्रभावित होंगे। सरकार ने जवाब में कहा कि यह बिल केवल तीन इस्लामिक देशों में रह रहे हिंदू,सिख,ईसाई,पारसी, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों के लिए है, जिन्हें वहां धार्मिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। 2014 से पहले वहां से वैध या अवैध तरीके से भारत में आए लोगों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान इस बिल में है। भारत के नागरिकों जिनमें मुस्लिम भी शामिल है, का इस बिल से कोई सरोकार नहीं है। यह बिल लोगों को नागरिकता प्रदान करता है, ना की किसी की नागरिकता छिनता है। परंतु विपक्षी पार्टियों ने खासतौर पर कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दल तथा वामपंथी पार्टियों ने इस बिल को बार-बार एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन) से जोड़ते हुए, बार-बार सरकार द्वारा दोनों को अलग-अलग बताया जाने के बावजूद, एक भ्रम की स्थिति पैदा की। वामपंथी सेकुलर नेताओं द्वारा इस बिल को भारत के नागरिक मुस्लिमों का विरोधी बताया और कहा कि इस बिल के द्वारा सरकार संविधान के समानता के अधिकार का हनन कर रही है। विपक्ष जिसे मैं वामपंथी-सेक्यूलर कहता हूं, के इस प्रचार से भारत के नागरिक मुस्लिमों में यह भ्रम घर पैदा कर गया कि उन्हें भारत से निकालने का भाजपा सरकार कोई षड्यंत्र कर रही है। इसी का नतीजा था दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में शांतिपूर्वक हो रहे विद्यार्थियों के प्रदर्शन में कुछ अवांछित लोग घुस गए और उन्होंने शांत प्रदर्शन को बड़ी आसानी से हिंसात्मक प्रदर्शन में बदल डाला। कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा का दिल्ली हिंसा के बाद यह बयान कि, ‘देश के विश्वविद्यालयों में घुसकर विद्यार्थियों को पीटा जा रहा है, जिस समय सरकार को आगे बढ़कर लोगों की बात सुननी चाहिए उस समय भाजपा सरकार उत्तर-प्रदेश, दिल्ली में विद्यार्थियों और पत्रकारों पर दमन के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। यह सरकार कायर है'। एक तरह से विद्यार्थियों और खास धर्म के लोगों को उकसाने वाला था।
आज 16 दिसंबर को उत्तर प्रदेश की राजधानी में धारा 144 लगी होने के बावजूद जिस तरह उपद्रवी सड़कों पर तबाही मचाते हुए निकले,सरकारी बसें फूंकी गई गई, लोगों के निजी वाहन फूंके गए, पुलिस पर पथराव किया गया,मीडियाकर्मियों को बंधक बनाकर पीटा गया उनके वाहनों को आग लगाई गई। उसके बाद भी कांग्रेस महासचिव का यह बयान बेहद भड़काऊ है, जो उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर दिया है, प्रियंका के अनुसार लोगों की आवाज को ताकत से दबाया नहीं जा सकता। हर बार ताकत लोगों पर राज करने के लिए आजमाई जाती है, आप लोगों के दीवार की तरफ धकेलते हैं वह और ताकत से खड़े होते हैं और उनकी आवाज ज्यादा तेज़ होती है। उनका बयान एकतरफा है वो इसलिए की भारत में लोकतान्त्रिक तरीके से बहुमत पाई सरकार शासन कर रही है न कि कोई सैन्य शासन। लेकिन वह एक बार भी लखनऊ हिंसा को गलत नहीं बताती। दिल्ली की तरह ही लखनऊ में भी पुलिस के साथ-साथ उपद्रवियों द्वारा मीडिया पर भी हमला किया जाता है। सीपीआईएम के बैनर उठाए एक व्यक्ति से जब मीडिया कर्मी द्वारा सवाल पूछा जाता है तो वह उसे फेक न्यूज़ कहकर दुत्कार देता है। जाहिर है यह सेक्युलर वामपंथियों का एक गठजोड़ है जिसका मकसद देश और सरकार तक बात पहुंचाना नहीं बल्कि एक षड्यंत्र के तहत 'डायरेक्ट एक्शन डे' घोषित करना है। उनका मकसद सरकार को अस्थिर करना नहीं, देश तोड़ना है।

