उम्मीद है कि सोमवार को नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 संसद पटल पर रख दिया जाएगा। कैबिनेट से यह पारित हो चुका है, तथा इससे पूर्व भी अनेक बदलाव दूसरी सरकारें कर चुकी हैं। पूर्व में भी बीजेपी ने इस विधेयक को लाने की कोशिश की थी। इस विधेयक का मकसद तीन मुस्लिम देशों अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से आए गैर मुस्लिम शरणार्थियों को ना केवल भारत में शरण देना है बल्कि उन्हें भारत का नागरिक घोषित करना भी है। इनमें हिंदू ,सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी धर्म को मानने वाले लोग हैं। मुस्लिमों को इससे दूर रखा गया है। मुस्लिमों को दूर रखने का एक बड़ा कारण यह है की यह तीनों इस्लामिक राष्ट्र है जंहा मुस्लिमों का धार्मिक आधार पर उत्पीड़न सम्भव नहीं है। हालांकि कुछ लोग बांग्लादेश के संविधान की बात कर उसे सेकुलर राष्ट्र बताने पर तुले हैं, जो कि बिल्कुल गलत है। वास्तव में बांग्लादेश के संविधान में इस्लाम को बांग्लादेश का प्रमुख राष्ट्रीय धर्म घोषित किया गया है। मुस्लिमों को इस बिल से बाहर रखने के कारण कई नेताओं तथा विपक्षी पार्टी जैसे कांग्रेस तथा एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने न केवल इस बिल पर अपनी साम्प्रदायिक राजनीती शुरू कर दी है, इस विधेयक को मुस्लिम विरोधी तथा संविधान के विरुद्ध तक बता दिया है। चिरकाल से सर्वधर्म समभाव भारत की विशेषता है वही वसुधैव कुटुंबकम हर भारत्तीय के जीवन का आधार, एक हिंदू को किसी भी धर्म का आदर करने के लिए कुछ भी सिखाए जाने की जरूरत नहीं। वास्तव में यह डीएनए में ही है। विधेयक में मुस्लिमों को इसलिए नहीं रखा गया कि जिन तीन इस्लामिक देशों से वह भारत में आए हैं वहां उनका धार्मिक आधार पर कोई उत्पीड़न नहीं हो रहा। कई नेता इसे मुस्लिम विरोधी बताकर भारत के नागरिक मुसलमानों के खिलाफ भी बता रहे हैं, जबकि भारतीय नागरिक मुसलमानों का इस विधेयक से कोई लेना देना नहीं है। भाजपा सरकार ने विधेयक में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले छह धर्मों के लोगों जिनमें हिंदू ,ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी हैं को नागरिकता देने का प्रावधान किया है। जिन्होंने इन इस्लामिक देशों में धार्मिक उत्पीड़न से तंग आकर भारत में या तो गैर कानूनी तौर पर प्रवेश किया या यहां आने के बाद उनके दस्तावेजों की अवधि समाप्त हो चुकी है। सरकार 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में शरण ले चुके इन धार्मिक समुदाय के लोगों को भारत का नागरिक बनाना चाहती है, ताकि ये लोग भी निर्भय होकर भारत में रह सकें और भारत को अपना देश कह सकें।
इन तीनों इस्लामिक राष्ट्रों में खास तौर पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यको पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव, महिलाओं की प्रताड़ना, बच्चियों को उठाकर ले जाने जैसे अपराधों की बाढ़ है। गैर-मुस्लिम होने की वजह से इन राष्ट्रों में इनकी स्थिति बेहद दयनीय थी। 
सरकार का कहना है तथा आम धारणा भी कि इस्लामिक राष्ट्रों में मुसलमानों पर धार्मिक आधार पर जुल्म नहीं हो सकता, इसीलिए बिल में मुसलमानों को बाहर रखा गया। यदि एक उदाहरण के तौर पर लिया जाए तो भारत से अलग हटकर पाकिस्तान की जो बुनियाद पड़ी वह इस्लाम के नाम पर एक अलग देश के रूप में पड़ी। भारत और पाकिस्तान में बंटवारे के वक्त यह सुनिश्चित हुआ था कि जो व्यक्ति जहां रहना चाहे वह वहां रह सकता है। वहां की सरकारें उनकी रक्षा करेंगी, परंतु 1947 में पाकिस्तान में कुल आबादी का 25% हिंदू थे जो अभी केवल 1.6 प्रतिशत बचे हैं। पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के साथ ना केवल दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है, बल्कि उनकी बहन बेटियां भी वहां सुरक्षित नहीं है। पाकिस्तान में इस्लामिक शिक्षा अनिवार्य है। धर्म परिवर्तन की आड़ में गैर-मुस्लिमों को मुस्लिम बनाने का अभियान 1947 से ही चल रहा है। यही हाल बांग्लादेश का है, जहां हिंदुओं तथा गैर मुस्लिमों की आबादी तेजी से घट रही है। जबकि इन देशों के बनिस्पत भारत में मुस्लिमों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। बांग्लादेश में 2011 में एक बिल पारित किया गया जिसमें मुसलमानों द्वारा गैर मुस्लिमों की जमीनों पर किया गया कब्जा या सरकार द्वारा जब्त की गई जमीन गैर-मुस्लिम क्लेम भी नहीं कर सकते। बिल को सरकारी संरक्षण होने की वजह से गैर-मुस्लिमों की जमीन पर मुस्लिमों द्वारा कब्जा करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, इसका विरोध करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर भी आए दिन हमले किए जाते हैं। गैर-मुस्लिम इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं। गैर-मुस्लिमों से मारपीट, महिलाओं से दुष्कर्म,अपहरण, जबरन-वसूली, मंदिरों तथा उनके धार्मिक स्थलों में तोड़-फोड़ आम बात है। यही सबसे बड़ा कारण है कि मुसलमानों को इस बिल में दूर रखा गया। जिस देश में वह सुरक्षित है उन्हें भारत की नागरिकता देने की क्या जरूरत । साथ ही ये साफ़ सन्देश भी की हम एक संवेदनशील, संप्रभु राष्ट्र हैं कोई धर्मशाला नहीं।