पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा अथक प्रयासों से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ।महामना का मानना था कि भारत केवल हिंदुओं का नहीं अन्य धर्मों के लोगों का भी है।
महामना ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना पर कहा था कि यह जो प्रकाश और जीवन का केंद्र अस्तित्व में आ रहा है वह ऐसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक कार्यों से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे, बल्कि कहीं श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे। अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति ईमानदार रहेंगे।
आज इस विशाल विद्या केंद्र के अंतर्गत अनेक स्कूल कॉलेज अपना कार्य बखूबी कर रहे हैं। विश्वविद्यालय में अनेक संकाय विभिन्न प्रकार की शिक्षाएं जैसे आयुर्वेद, डेंटल के अलावा पारंपरिक शिक्षा भी प्रदान कर रहे है । इन विभिन्न संकाय में भारत के लगभग सभी जातियों वह धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव के कार्यरत है । परंतु अचानक एक दिन फिरोज खान के नाम पर एक संकाय में जिसमें 8 विभाग हैं, में से एक विभाग मैं शिक्षा ग्रहण कर रहे विद्यार्थी नवनियुक्त हुए फिरोज के धर्म को लेकर आपत्ति जता देते हैं। विश्वविद्यालय का यह संकाय संस्कृत विज्ञान वह धर्म विज्ञान के नाम से जाना जाता है ।
यहां एक प्रश्न सभी लोगों का है की यदि एक दूसरे धर्म का व्यक्ति संस्कृत की शिक्षा देता है तो इसे धर्म के चश्मे से देखने की आवश्यकता नहीं है । मूल रूप से यह बात बिल्कुल सही भी है परंतु शायद ही किसी ने इसके मूल विरोध का कारण खोजने की कोशिश की हो । जैसा कि ऊपर बताया गया है कि इस संकाय में 8 विभाग हैं । जिसमें से यह एक विभाग धार्मिक शिक्षाएं देता है। इस विभाग का एक काम यज्ञ, पूजा-पाठ मंत्र उच्चारण, वेद-पाठ एवं अन्य धार्मिक कर्मकांडों से जुड़ा है। इस विभाग के विद्यार्थियों की इसी बात को लेकर आपत्ति है कि एक अन्य धर्म का व्यक्ति यह सारे धार्मिक-अनुष्ठान व कर्मकांड, क्या उसी धार्मिक आस्था से करवा पाएगा। क्या एक मुस्लिम यज्ञोपवित एवं यज्ञ की पवित्रता, मंत्रोच्चार, वेद का पठन-पाठन एवं अन्य धार्मिक कर्मकांड पर आस्था एवं विश्वास कर पाएगा जैसा विश्वास एवं आस्था से अन्य सनातनी हिंदू करता है । इस परिप्रेक्ष्य में विभाग के विद्यार्थियों का संदेह अनदेखा करना सही नहीं होगा ।
फिरोज खान की काबिलियत को नकारा नहीं जा सकता। निसंदेह उनका चयन उनकी योग्यता के आधार पर ही किया गया है। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भाषा में विद्वता होना तथा धार्मिक आस्था होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भाषा को पढ़ना और पढ़ाना एक अलग विषय है जबकि किसी एक धर्म को विद्यार्थियों को सिखाने के विषय में जानकारी के साथ-साथ उसमें आस्था और विश्वास होना एक अध्यापक के लिए अति आवश्यक है । एक अध्यापक का उसके द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय में विश्वास ही एक विद्यार्थी को सफलता दिलवाने में सहायक होते हैं।
एक सनातनी के लिए संस्कृत भाषा देवों की भाषा है जिसमें उसके पूर्वज ईश्वर की प्रार्थनाएं एवं आह्वान करते हैं । यह उसकी धार्मिक आस्थाओं से जुड़ा हुआ है। उसी प्रकार जिस प्रकार हिंदू के लिए गंगा एक नदी नहीं मोक्षदायिनी देवी है लेकिन एक अहिंदू के लिए मात्र एक नदी।
फिरोज खान की संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति अवश्य ही उनकी योग्यता के आधार पर हुई होगी ना की जाति, धर्म, लिंग के आधार पर / धार्मिक संकाय के विद्यार्थियों को एक मौका अवश्य फिरोज को देना चाहिए। हो सकता है इन विद्यार्थियों की आशंका निर्मूल साबित हो, दूसरी दशा में अगर वह अपने ज्ञान और योग्यता को धार्मिक विश्वास व आस्था के साथ साबित कर पाने में असफल रहे तो उन्हें केवल संस्कृत पढ़ाने तक सीमित किया जा सकता है.


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